अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पर बलात्कार प्रकरण दर्ज, गिरफ़्तारी न्यायालय से हुए आदेश पारित - News Vision India

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7 Apr 2018

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पर बलात्कार प्रकरण दर्ज, गिरफ़्तारी न्यायालय से हुए आदेश पारित

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क्राइम की परिभाषा है अपने आप में एक नई चरम सीमा को स्पर्श करते हुए क्राइम रिकॉर्ड में नया इतिहास दर्ज किया है यह मामला है पुलिस मुख्यालय का जहां पर पदस्थ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने जो कि बतौर लोकसेवक वहां पर पदस्थ रहे हैं जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है

और आजकल महिलाओं पर हो रहे अपराधों में उत्तरोत्तर वृद्धि कहीं न कहीं पुलिस की लापरवाही का ही नतीजा होता है अपने स्तर पर हर जिले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक इन अपराधियों पर नकेल कसने में पूरी तरह से प्रयास कर रहे हैं और उन्हें सफलता भी मिल रही है परंतु इस घटना से अनभिज्ञ सभी पुलिसकर्मी स्तब्ध हैं यह जानकर के कि पुलिस मुख्यालय में भी कुछ ऐसे वरिष्ठ अधिकारी होते हैं जिन्होंने अपने अधीनस्थ पदस्थ महिला आरक्षक के साथ इस तरह का कृत्य किया और उसे भी न्याय के लिए भटकना पड़ा माननीय न्यायालय से जब आदेश पारित हुआ प्राथमिकी दर्ज करने का और  विषय संबंधित धाराओं को जोड़ने का तब जाकर आरोपी पुलिस अधीक्षक की गिरफ्तारी हो सकी


 Adl.S.P. के खिलाफ 376, 376(2), 376 C, 166, 506, 509, 511- IPC की धाराएँ बढाने हेतु, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी न्यायालय भोपाल में, पुलिस मुख्यालय भोपाल में कार्यरत पीड़ित महिला पुलिस आरक्षक की ओर से अधिवक्ता श्री सुभाष चन्द्र सोनी एवं श्री ओम शंकर श्रीवास्तव द्वारा CRPC की धारा 216 के तहत याचिका दायर की गयी है |

पुलिस मुख्यालय भोपाल में कार्यरत पीड़ित महिला पुलिस आरक्षक, जो की इनके वरिष्ठ अधिकारी ASP श्री राजेंद्र वर्मा के अधीन कार्यरत थी, -- 
इस पीड़ित महिला पुलिस आरक्षक द्वारा सर्वप्रथम, इनके ही वरिष्ठ अधिकारी ASP श्री राजेंद्र वर्मा के विरुद्ध यौन शोषण जैसे घृणित संगेय अपराधों का आरोप लगाते हुए, एक लिखित सूचना (FIR को पंजीबद्ध करने हेतु) दिनांक 10/11/2017 को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक महोदया, महिला अपराध शाखा पुलिस मुख्यालय में दी गई थी, -- 

परन्तु जिस पर 12 दिनों तक कोई भी विधिक कार्यवाही नहीं की गई और ना ही माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा ललिता कुमारी vs यू.पी. राज्य के केस में पारित आदेशों के परिपालन में FIR पंजीबद्ध की गई थी -- 

लेकिन फिर जब मामला मीडिया और प्रेस में तूल पकड़ने लगा तब इसके पश्चात्, दिनांक 22/11/2017 को, मीडिया और प्रेस का दवाब बढ़ने के बाद ही, जहाँगीराबाद भोपाल थाने में इस FIR को IPC की केवल एक धारा 354 (A) के अंतर्गत पंजीबद्ध किया गया था |

तत्पश्चात वरिष्ठ अधिकारी ASP श्री राजेंद्र वर्मा को पुलिस द्वारा गिरिफ्तार किया गया और उसी दिन रिमांड होने पर माननीय न्यायालय से जमानत पर रिहा भी किया गया था |

तत्पश्चात पुलिस द्वारा जो अंतिम प्रतिवेदन दिनांक 29/12/2017, माननीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था - एवं इसमें IPC के केवल और दो (02) धाराएँ 354 एवं 342 को, पीड़ित द्वारा माननीय न्यायालय में CRPC धारा 164 में दिए गए बयान के आधार पर बढ़ा दिया गया था |

लेकिन ऐसी बहुत से महत्वपूर्ण तथ्यों, कथनों, परिस्थितियों और आधारों को, जो की पीड़ित महिला पुलिस आरक्षक द्वारा पुलिस को एवं माननीय न्यायालय को दिए गए कथनों में बताये गए थे - जिनकी अनदेखी पुलिस द्वारा इनके अंतिम जांच प्रतिवेदन में IPC की उपरोक्त धाराओं को 376, 376(2), 376 C, 166, 506, 509, 511 को ना जोड़ने की भूल की गई थी |

जबकि पीड़ित महिला पुलिस आरक्षक की ओर से उपरोक्त दोनों ही धिवक्ता श्री सुभाष चन्द्र सोनी एवं श्री ओम शंकर श्रीवास्तव द्वारा CRPC की धारा 216 के तहत याचिका दायर कर माननीय न्यायालय से उपरोक्त सभी धाराओं को जोड़ने के लिए प्रार्थना की गई है | परंतु कोई कार्यवाही नहीं की गई सहारा संध्या न्यायालय से आदेश पारित होने के बाद भी कार्यवाही का हिस्सा बना और धाराओं में इजाफा हुआ















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