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16 Nov 2018

चुनाव जीतेगी पार्टी और हारेगी जनता, MP ELECTION 2018


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जब किसी के पास विकास की प्रोपर योजना ही नही , देश ही थीयोएरिकल और प्रेक्टिकल इकोनोमी की जानकारी, अनुभव नही ऐसे प्रतिनिधि देश के विकास की गति को किस दिशा में ले जायेंगे, उनके लिए खुद को पद पर बनाये रखना अपने आप में एक बड़ा अपवाद का विषय है, पूरे कार्यकाल में यह समय बमुश्किल निकलता है, मानव समाज के लिए सोचने की फुर्सत नही रहती, चुनाव के पहले वादों कि कोई कमी नही रहती. 

जिस देश में शराब पैसा और बाहुबल से चुनाव लड़ा जाता है,  जिस देश में प्रत्याशी पार्टी का पुराना कार्यकर्ता होता है,  जिस देश में पार्टी के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अधिकार जनता से छीन लिए जाते हैं,  ऐसी पार्टियों की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी-EAST INDIA COMPANY   से की जाना गलत तो नहीं है,  ठीक वैसे ही जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया था,  अपने कुछ लोगों को भारत के ही निवासियों को नौकरी देकर लालच-प्रलोभन देकर अधीनस्थ कर्मचारी बना दिया था, अपने अधिनस्थ सिपाही और चपरासी बना दिया था,

उसी प्रकार हमारे देश में दो बड़े राजनीतिक दल देश के युवाओं को अपना कार्यकर्ता बनाकर अपने आवश्यकता अनुसार उपयोग करते नजर आ रहे हैं, हमारे देश को जनता को विकास की आवश्यकता है, हमारे देश में जनता को व्यवस्था की आवश्यकता है, हमारे देश में जनता को शिक्षा की व्यवस्था की आवश्यकता है, हमारे देश में किसी पार्टी की सरकार की आवश्यकता नहीं है ,कभी कोई पार्टी-कभी कोई पार्टी, यह सोच ले  सरकार बनाने की जद्दोजहद नए-नए प्रलोभन और नए-नए मेनिफेस्टो की लिस्ट हर बार जारी होती है,  रंतु योजनाओं स्वरूप चालू भी होती है और विलुप्त भी हो जाती हैं

कांग्रेस का एजेंडा अलग है चुनाव लड़ने का, बीजेपी का अलग एजेंडा है चुनाव लड़ने का

दोनों बड़े राष्ट्रीय दल है हमारे देश में व्यवस्था संचालन जनकल्याण, किसान कल्याण, कानून व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था की बड़ी-बड़ी डींगे मारते हुए नजर आते हैं, परंतु उनके खुद के दलों में कई ऐसे प्रत्याशी कई ऐसे कार्यकर्ता हैं जो खुद ही का साथ छोड़ देते हैं चुनाव के समय खुद की बारी की प्रतीक्षा में रहते कार्यकर्ता-पदाधिकारी आश्वासन में उम्र गुजार देते है, फिर शुरू होता है बागवत का सिलसिला, 

पार्टी के  खुद के गठबंधन की हकीकत खुल  कर के सामने आ जाती है,  जो पार्टी खुद के कार्यकर्ताओं को नहीं संतुष्ट कर सकती,  भला वह देश के प्रत्येक नागरिक तक कैसे और कैसे संतुष्टि का प्रभाव डाल सकेगी

अफसोस की बात है,  पार्टी के पास भी वही नेता होते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि ना  ही वकालत की दुनिया से होती है, ना व्यवसाय की दुनिया से होती है, न शिक्षा की, ना  मेडिकल की और ना ही कानून और व्यवस्था से संबंधित कोई पृष्ठभूमि किसी की होती है,  अनावश्यक कहां से एक रसम सी बन गई है,  देश की जनता को मूर्ख बनाने की पिछले 70 सालों से दल बदल बदल जाते हैं जंता शोषित होती रहती है, 

अब खुद के बाहुबल पर चुनाव लड़ रहे है, जीतेंगे भी खुद के लिए, युवाओ को नसीहत है अपना कीमती समय एक अच्छा व्यवसायी-प्रोफेशनल पारंगत होने में व्यतीत करे,  अनुभव की पराकाष्ट से सुखो अभाव दूर होता है, राजनीती में जीवन की नीतियाँ शिथिल हो जाती है.   

इसीलिए कहते है, :- चुनाव जीतेगी पार्टी और हारेगी जनता, क्योकि प्रत्याशी-प्रतिनिधि, पार्टी का है, जनता से सीधे नही, और टिकट की जद्दोजहद की हकीकत किसकी जानकारी में नही, फिर भी प्रत्याशी कांफिडेंट से वोट मांगने आता है सिर्फ अपने लिए. 











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