स्कूटर से सरकारी राशन की ढुलाई, CAG की रिपोर्ट के बाद दिल्ली सरकार कराएगी 50 मामलों की CBI जांच - News Vision India

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5 Apr 2018

स्कूटर से सरकारी राशन की ढुलाई, CAG की रिपोर्ट के बाद दिल्ली सरकार कराएगी 50 मामलों की CBI जांच

CBI Inquiry In Delhi Food Scam
सीएजी रिपोर्ट में उजागर गड़बड़ियों पर दिल्ली सरकार सख्त है। बड़ी खामियों की सरकार सीबीआई जांच की सिफारिश करेगी। सूत्रों की मानें तो शुरुआती तौर पर खाद्य आपूर्ति व उपभोक्ता विभाग, दिल्ली नगर निगम समेत दूसरे विभागों से जुड़े करीब 50 घोटालों की पहचान की गई है।
मुख्यमंत्री रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन से कर रहे हैं। आने वाले दिनों में सभी संदिग्ध मामलों की जांच सीबीआई से कराने की केंद्र सरकार से सिफारिश की जाएगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देर शाम ट्वीट किया कि सीएजी रिपोर्ट में दर्ज हर घोटाले पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।

ये हैं कैग में बताई गई गड़बड़ियां
स्कूटर-बाइक से हो रही सरकारी राशन की ढुलाई
घर-घर राशन पहुंचाने की योजना पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल में चल रही जंग के बीच दिल्ली की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बड़े पैमाने पर घोटाले का खुलासा हुआ है। भारतीय खाद्य निगम के भंडार गृहों से सरकारी राशन की दुकानों तक पर्याप्त मात्रा में राशन नहीं पहुंच रहा है।

राशन ले जाने वाले वाहनों में स्कूटर, मोटरसाइकिल, ऑटो व बस के नंबर तक दर्ज हैं। वहीं, फर्जी मोबाइल नंबरों पर एसएमएस अलर्ट भेजे जा रहे हैं। नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में खाद्य आपूर्ति व उपभोक्ता मामलों के विभाग में परत दर परत खामियां उजागर हुई हैं। मंगलवार को उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इसे विधानसभा में पेश किया।
राशन ले जाने वाले 207 वाहनों की सैंपलिंग की
नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने भारतीय खाद्य निगम से फूड प्राइज शॉप (एफपीएस) तक राशन ले जाने वाले 207 वाहनों की सैंपलिंग की। इसमें से आठ वाहन ऐसे मिले, परिवहन विभाग में जिनका पंजीकरण स्कूटर, मोटरसाइकिल, बस व ऑटो के नाम हुआ है।

इनसे 1,589 क्विंटल राशन दुकानों तक पहुंचाया गया। वहीं, 42 वाहन पंजीकृत ही नहीं थे, जबकि आठ वाहन दूसरे विभागों से संबंधित थे। रिपोर्ट बताती है कि इस तरह की ढुलाई से राशन चोरी की आशंका है।

दूसरी तरफ गोदामों से जब राशन दुकानों के लिए भेजा जाता है, तो कार्ड धारकों को एसएमएस भेजा जाता है, लेकिन इसमें भी हेराफेरी हो रही है। 2,453 मामलों में लाभार्थियों के मोबाइल नंबर एफपीएस लाइसेंस धारकों के थे, जबकि हकीकत में वह योजना के लाभार्थी हैं ही नहीं। वहीं, राशन दुकानदारों के आंकड़ों में भी गड़बड़ियां दिखीं। विभाग यह सत्यापित करने में भी नाकाम रहा कि कार्ड धारक जरूरी पात्रता रखते भी हैं या नहीं।
दिल्ली को हरा-भरा बनाने में केजरीवाल सरकार पिछड़ी
दिल्ली सरकार के पास न कोई हरित नीति है और न ही वायदे के मुताबिक सरकार ने पौधरोपण कार्यक्रम को अंजाम तक पहुंचाया है। सीएजी रिपोर्ट में वन एवं वन्य जीव विभाग में कई तरह की लापरवाही उजागर की गई हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पौधरोपण कार्यक्रम से जुड़ी एजेंसियों ने 2014-2017 के दौरान 28.12 लाख पौधे लगाए, जबकि लक्ष्य 36.57 लाख पौधे लगाने का था। इसकी वजह से 23 फीसदी पौधरोपण नहीं हो सका। सीएजी ने इस कार्यक्रम की क्षमता और इसे लागू करने के तरीके पर सवाल खड़े किए हैं।

इतना ही नहीं, सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के पास दिल्ली वन नीति और इससे जुड़ी कोई भावी योजना नहीं थी, जिससे यह साफ हो सके कि वन क्षेत्र में बढ़ोतरी पर कोई खास काम हुआ है। दिल्ली को हरा-भरा बनाने की योजना 2007-08 के बाद से अभी तक तैयार नहीं हो सकी है।

दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम-1994 के तहत 2014-17 के दौरान वृक्ष प्राधिकरण की सिर्फ एक बैठक हुई, जबकि इस अवधि में 12 बैठकें होनी थीं। पेड़ों की अवैध कटाई को लेकर भी सरकार ज्यादा संजीदा नहीं रही। 2014-17 के बीच पेड़ काटने के 285 मामले दर्ज हुए। सात मामलों में 4.60 लाख रुपये का हर्जाना लगाया गया, लेकिन अगस्त 2017 तक वसूला नहीं जा सका था।
आर्थिक संकट के बावजूद दिल्ली के तीनों नगर निगम सजग नहीं
तीनों नगर निगम एक ओर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं, वह दिल्ली सरकार से फंड नहीं मिलने पर दिक्कत होने का आरोप लगाते रहते हैं। इसके अलावा वह अपनी योजनाओं को कम खर्च में पूरा नहीं कर रहे हैं। वह योजनाओं पर काफी अधिक राशि खर्च कर रहे हैं। इसका खुलासा मंगलवार को विधानसभा में दिल्ली सरकार की ओर से रखी गई कैग रिपोर्ट में हुआ।

तीनों नगर निगम ने खासकर सड़कें बनाने और उन पर फ्लाईओवर का निर्माण करने में तय राशि से काफी अधिक खर्च किया है। दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने बिजवासन रोड पर फ्लाईओवर के डिजाइन का कार्य सौंपे जाने के पश्चात उसमें कई बदलाव किए। इसके चलते इस योजना पर 8.33 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए।

इसी तरह डाबरी चौराहे पर ग्रेड सेपरेटर कार्य में 19.35 करोड़ रुपये अधिक खर्च हुए और अधिक राशि खर्च करने के लिए तकनीकी स्वीकृति नहीं ली गई थी। वहीं नगर निगम ठेकेदार के कार्य छोड़ देने पर उससे मोबिलाइजेशन अग्रिम और ब्याज के 1.07 करोड़ रुपये वसूल नहीं सके।

पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने वजीराबाद सड़क से शिव विहार तिराहे के लिए करावल नगर रोड की अपूर्ण रिमॉडलिंग पर 8.34 करोड़ रुपये बेवजह खर्च कर दिए। वहीं 11 निर्माण कार्यों में कंस्ट्रक्टिंग बेस कोर्स उपलब्ध कराए बिना बिटुमिन मास्टिक कार्पेट पर 8.09 करोड़ रुपये व्यय किए गए। इसी तरह नौरोजी नगर और पुष्प विहार में पर्यावरण के मानदंडों की अनुपालना सुनिश्चित किए बिना नालों को ढंकने के कार्यों पर 40.58 करोड़ रुपये व्यय किए गए।

उत्तरी दिल्ली नगर निगम की ओर से तय समय पर रानी झांसी रोड पर ग्रेड सेपरेटर का कार्य पूरा नहीं होने पर 5.22 करोड़ रुपये की लागत में वृद्धि हुई। इसके अलावा 14 डिवीजनों में 82 कार्यों के लिए 242.55 करोड़ का अंतिम भुगतान अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के दौरान अपेक्षित प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना किया गया था, जबकि 48 कार्य अभी चल रहे हैं।

दिल्ली सरकार का विकास पर ध्यान नहीं : तिवारी
नई दिल्ली। दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि कैग रिपोर्ट ने दिल्ली सरकार की पोल खोल दी है। विधानसभा में प्रस्तुत कैग रिपोर्ट के बाद खुलासा हो गया है कि दिल्ली सरकार विकास पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है। स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे मुद्दों पर उसके सभी दावे केवल हवा हवाई हैं। आयुष एवं खाद्य सुरक्षा से जुड़े सरकार के काम में धांधलियां भी चल रही है।
दिल्ली में खेलकूद की सुविधाएं लचर, CM का LG पर हमला
सीएजी रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में खेलकूद की सुविधाएं लचर है। रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा निदेशालय ने 2001 की खेलकूद नीति के अनुरूप दिल्ली की खेलकूद नीति तैयार नहीं की है। खेलकूद सुविधाओं का विकास भी निदेशालय की प्राथमिकता में नहीं है।

शिक्षा निदेशालय के 13 जिलों में से तीन में एक भी खेलकूद सुविधा नहीं है, जबकि छह जिलों में स्वीमिंग पूल के अलावा दूसरी कोई खेल सुविधा नहीं है। रिपोर्ट का कहना है कि 2003 में दिल्ली स्पोर्ट्स स्कूल भूमि अधिग्रहण के बावजूद जून 2017 तक स्थापित नहीं किया गया। साथ ही निधियां जारी करने में देरी, गतिविधियों का गैर-संचालन और कोच की कमी जैसी खामियों से खेलकूद गतिविधियां प्रभावी नहीं हैं।

मुख्यमंत्री का उपराज्यपाल पर हमला
खाद्य आपूर्ति व उपभोक्ता मामलों के विभाग की कैग रिपोर्ट के सहारे मुख्यमंत्री ने उपराज्यपाल पर हमला किया। उन्होंने कहा कि खाद्य आपूर्ति व उपभोक्ता मामलों के विभाग पर आई टिप्पणी सीएजी रिपोर्ट का सार है। घर-घर राशन पहुंचाने की दिल्ली सरकार की योजना पर रोक लगाकर इसी प्रणाली को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। पूरी राशन वितरण प्रणाली राशन माफिया के चंगुल में है। नेताओं ने इन्हें संरक्षण दे रखा है। घर-घर राशन पहुंचाने की योजना को राशन माफिया ने खत्म कर दिया है।
68 ब्लड बैंकों में से 32 के पास लाइसेंस नहीं
दिल्ली के स्वास्थ्य के हालात पर भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। इसके तहत पिछले वर्ष मार्च तक दिल्ली में करीब 50 फीसदी ब्लड बैंक बगैर लाइसेंस के संचालित थे। कुल 68 ब्लड बैंकों में से 32 के पास लाइसेंस नहीं था।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी माना है कि सरकार की सुस्त प्रक्रिया के चलते ये लाइसेंस के बगैर ब्लड बैंक चल रहे थे। पूछताछ में पता चला था कि इन ब्लड बैंकों ने लाइसेंस नवीनीकरण के लिए आवेदन किया हुआ है, लेकिन लंबे समय बाद भी न तो इनके लाइसेंस का नवीनीकरण किया और न ही इसे निरस्त।

16 पन्नों की इस रिपोर्ट में कैग ने बताया है कि ज्यादातर ब्लड बैंक आम जनता के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल पर ब्लड बैंक की ओर से रक्त या उसके अवयव से जुड़ी जानकारी नहीं दी जाती।

इसकी वजह से पोर्टल के जरिये आम आदमी तक ये जानकारी नहीं पहुंच पाती, जबकि सरकार ने यह सुविधा आम मरीजों को समय रहते रक्त की आपूर्ति के लिए उपलब्ध कराई है। स्वैच्छिक रक्त संग्रहण 2014-15 के दौरान 54.55 फीसदी से घटकर 2016-17 के दौरान 45.20 फीसदी हुआ। रिपोर्ट में ब्लड बैंकों की कार्यप्रणाली पर निरीक्षण एवं निगरानी अपर्याप्त पाई गई।

मंगलवार को विधानसभा में पेश हुई कैग रिपोर्ट ने स्वास्थ्य को लेकर दिल्ली सरकार पर कई तरह के सवालिया निशान खड़े किए हैं। आयुष क्लीनिक में स्टाफ की भर्तियों से लेकर अस्पतालों में नियमों के खिलाफ जाकर करोड़ों रुपये के टेंडर शामिल हैं।

इलाज से वंचित रहे कैंसर मरीज
रिपोर्ट में कैंसर मरीजों के उपचार को लेकर भी गंभीरता जताई गई है। इसके अनुसार दिल्ली राज्य कैंसर अस्पताल में नवंबर 2014 तक आंत्र रोगी विभाग शुरू होने की योजना अक्तूबर 2017 तक चालू नहीं हुई। इस कारण कैंसर मरीज इलाज से वंचित रहे।

100 फीसदी दवाएं उपलब्ध नहीं
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, पांच साल के दौरान दिल्ली के आयुर्वेद और होमियोपैथी अस्पतालों में मरीजों को 100 फीसदी दवाएं उपलब्ध नहीं हुईं। वर्ष 2012 से 2017 के बीच महज 40 फीसदी दवाएं ही मरीजों को मिल सकीं। वहीं 2012 से 2017 के बीच आयुर्वेदिक व यूनानी दवाइयां 25 से 58 फीसदी की घटी हुई सेल्फ लाइफ के साथ खरीदी गई। रिपोर्ट की मानें तो दिल्ली में तीन कमरों की जरूरत की तुलना में 16 आयुर्वेदिक अस्पताल दो कमरों में और पांच एक कमरे में चल रहे थे, जबकि 103 होमियोपैथी क्लीनिक में से सिर्फ 24 में ही पूरा स्टाफ मिला। अन्य सभी क्लीनिक में डॉक्टर, फॉर्मासिस्ट्स के पद रिक्त पड़े हैं।
दिल्ली की सड़कों पर चल रही 2682 बसों का इंश्योरेंस नहीं है। डीटीसी ने 17 बसों में आग से हुए करोड़ों के नुकसान के बाद भी बसों का बीमा कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसका नुकसान डीटीसी को हुआ, लेकिन बस प्रदाता कंपनी टाटा मोटर्स लिमिटेड को अनुचित फायदा हुआ।

यह खुलासा मंगलवार को आई सीएजी रिपोर्ट में हुआ है। सीएजी का कहना है कि जुलाई 2017 में इस संबंध में दिल्ली सरकार को नोटिस दिया गया लेकिन अभी तक उनका जवाब नहीं आया है।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, एक जनवरी 2015 को अंबेडकर नगर डिपो में 17 लो फ्लोर बसों में आग लग गई, जिससे डीटीसी को 10.24 करोड़ का नुकसान हुआ। इंश्योरेंस नहीं होने से डीटीसी को उस नुकसान की भरपाई नहीं मिली।

एक अनुमान के मुताबिक, अगर बीमा होता तो उस समय उन बसों की लागत 5.86 करोड़ रुपये होती। इसके अलावा 17 बसें नहीं होने से परिचालन से होने वाले राजस्व में डीटीसी को प्रतिवर्ष 1.13 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

सीएजी रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी ने इस आग की घटना की जांच की। जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि आग की वजह कोई बदनीयती नहीं थी, लेकिन आग लगने की सटीक वजह पता नहीं चली। बसों के रखरखाव में लापरवाही की बात की गई, जिसके रखरखाव की जिम्मेदारी टाटा मोटर्स लिमिटेड की जिम्मेदारी थी।

दरअसल डीटीसी सिर्फ तीसरे पक्ष को लेकर बीमा कराती है। यानी बस जब सड़क पर उतरती है तो उससे अगर किसी को नुकसान होता है तो उसका बीमा डीटीसी कराती है। मगर खड़ी बस के इंश्योरेंस का जिम्मा उसी बस प्रदाता कंपनी की है जिसके पास रखरखाव का जिम्मा है। मगर टाटा कंपनी ने रखरखाव का जिम्मा होने के बाद भी 2682 बसों का इंश्योरेंस नहीं कराया। जिससे 17 बसों में आग लगने के नुकसान की भरपाई नहीं हो पाई।

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