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23 Oct 2018

अमृतसर रेल हादसा : मीडिया ने अपने धर्म का पालन नहीं किया

Special Report On Amritsar Train Accident
लखनऊ स्टेट हेड न्यूज विजन उत्तर प्रदेश भानू मिश्रा की विशेष चिन्तन प्रस्तुति

रेलवे ट्रैक को कम्युनिटी हॉल नहीं समझा जा सकता. कि जहां सामुदायिक स्तर पर खड़े होकर के जलसे किए जाएं.
मीटिंग किया जाए.
अथवा किसी भी कार्यक्रम को रेलवे ट्रैक पर दर्शक खड़े करके मज़मा लगवाया जाए
जिन लोगों ने भी रेलवे ट्रैक को बाधित करने का प्रयास किया है. वे खुद रेलवे के नियम कानून के मुताबिक अपराध के दायरे में आते हैं जिन्होंने रेल ट्रेक को बाधित करने का प्रयास किया.
या जो लोग खड़े थे.
उनमें से कितने बुद्धिमान और भले लोग थे ?
साधारण सी रेलवे क्रॉसिंग पर जो भी मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग होती है.
वहॉ लिखा रहता है
कृपया रेलवे लाइन पार करने के पहले दोनों तरफ देख लें. गाड़ी तो नहीं आ रही है सियासत करना अलग बात है.
सच्चाई की बात कहना बेहद अलग बात है.
जो लोग मारे गए इस दुर्घटना में.
उनके लिए ईश्वर से शांति की प्रार्थना और सहानुभूति देना हर मनुष्य का कर्तव्य है.

लेकिन ड्राइवर ने क्यों नहीं देखा?
रेलवे ने संज्ञान में क्यों नहीं लिया?
आरपीएफ की पुलिस वहां क्यों नहीं थी?
सिद्धू जी की पत्नी वहां भाषण दे रही थी. आयोजक मंडल की भी कुछ जवाबदारी होती है? एक मदारी भी मजमा लगाने के पहले अंदाजा लगा लेता है उसका क्या असर होगा?
अगल बगल में कहीं डीएम साहब का बंगला तो नहीं है.
या कहीं मेरी वजह से आने जाने वाले साहिबान का रास्ता तो नहीं बंद हो जाएगा

हिंदुस्तान की सियासत पर चर्चा करने वाले आधे से अधिक लोग जिनको यह भी नहीं पता है की संडास से आने के बाद साबुन से क्यों धोना चाहिए?
ऐसे लोग भी सपा बसपा कांग्रेस और भाजपा पर बेहद तीखे कमेंट करते नजर आते हैं.
गवारों की तरह खड़े होकर के रेलवे ट्रैक पर जलते हुए रावण की फोटोग्राफी करने के शौक में.
हाथ में महगेे मोबाइल सेट लिए.
और कांख में सेंट मारे वे लोग
रेलवे का इतना भी नियम न जान सके कि इस पटरी पर कभी भी गाड़ी आ सकती है.
मैं भाग कर कहां जाऊंगा ?
अच्छे खासे मर्दों का दिल भी पिघल कर शीशे की तरह बह जाएगा
जब इतनी बड़ी दुर्घटना सामने दिखेगी .
पता नहीं कितने लोग अपने आप से बेहोश हो जाएंगे
या हो सकता है कि कमजोर दिल वाले की मौत ही हो जाए
ऐसी स्थित में नवजोत सिंह सिद्धू की बीवी से यह उम्मीद रखना
तुम भाग क्यों गई?
खड़े होकर के लोगों का हौसला अफजाई क्यों नहीं किया.
ताकि जो लोग उन्हें नहीं पसंद करते थे.
उन्हीं की ग़लती का हवाला देकर
कि भीड़ इन्होंने बुलाया है, पीट-पीटकर मार डाले.
रेलवे के ड्राइवर ने ट्रेन को क्यों नहीं खड़ी किया वहां?
जहां पर ऐसा हादसा हुआ था?

हजारों लोगों का गुस्सा शायद उस ट्रेन पर फूट पड़ता
और उसमें जो यात्री बच्चे स्त्रियां बूढ़े बुजुर्ग बीमार सफर कर रहे थे.
हो सकता है ट्रेन जला दी जाती.
या यात्रियों को भी नुकसान पहुंचाया जाता
प्रथम दृष्टया तो मुझे ड्राइवर बुद्धिमान लग रहा है.
किसी मोड़ पर नहीं दिखाई दिया कि यहां भीड़ खड़ी है.
हमारे ट्रैक को जाम किए है. दुर्घटना होने की दशा में भाग जाना एक मानवीय आदत और जरूरत है
मीडिया आज उस ट्रेन को तलाश रही है.
जिसको वह हत्यारी ट्रेन कह रही है.
कहां थी मीडिया तब जब ट्रैक पर लोगों ने भीड़ जमा रखा था?
मीडिया ने क्यों नहीं अपना कैमरा चलाकर अपने व्हाट्सएप और पोर्टल चला कर सरकार और उनके नुमाइंदे को बताते कि हजारों की भीड़ ने ट्रक को जाम रखा है
यहां हादसा हो सकता है. मीडिया को इस मैटर में किसी भी तरह की सियासत करने की छूट कहां से आ जाती है?
क्या मीडिया ने अपने धर्म का पालन किया ?

जितनी भी जवाबदारी एलआईयू और स्थानीय पुलिस की बनती है
उतनी जमीं हुई भीड़ के बाबत.
अपने वरिष्ठ अधिकारियों को क्यों नहीं बताया.
उतनी ही जवाबदारी मीडिया की है कि इतना बड़ा हादसा होने के पहले रेलवे ट्रैक पर भीड़ लगाए हुए लोगों के बाबत मीडिया ने अपने किस दायित्वों का निर्वहन किया?
ऐसी खबर को छुपाकर क्यों रखा ?
जो आज कांग्रेस और भाजपा को अन्य लोगों को साथ में रहकर

टेलीविजन पर झगड़ालू औरतों की तरह डिबेट करवा रहा है.
शर्म क्यों नहीं आ रही है. मीडिया को सुनता हूं मीडिया वाले उस हत्यारिन ट्रेन को तलाश रहे हैं जिससे हादसा हुआ है.
कहते हैं कुछ पर खून के धब्बे लगे हैं
मुझे निशान ढूंढना है. शायद रेल प्रशासन ने उसे छुपा दिया है.
अपने को खोजी बता कर मीडिया क्यों अपना पीठ थपथपाना चाहती है.
सच तो यह है वास्तव में एक अनुभव हीनता का उत्साह का, आनंद का उन्माद का ,धार्मिक नशा का ,रावण के दहन का, आनंद लेने की वजह सेएहादसा पैदा हुआ है. एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय नुकसान है.
कई परिवारों की जिंदगी बर्बाद हो गई.
तमाम लोग हमसे जुदा हो गए.

उनके लिए श्रद्धांजलि नम आंखों से देनाउस आत्मा व मृतक परिवार के साथ सहानुभूति और प्यार है. लेकिन मीडिया और सरकार लोकल पार्टियों के नेता और यहां तक कि वहां उपस्थित प्रबुद्ध भीड़ भी उस हादसे की उतनी जिम्मेदार है. जितना कि आज बहस करने वाले।

देखे सुलतानपुर मे लोगो द्वारा मोमबत्ती जला कर मरने वालो की आत्मा की शान्ति प्रदान के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर के हुए

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