वाणिज्यिक कर विभाग के ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश का एक और केस सामने आया - News Vision India News Latest News India Breaking India News Headlines News In Hindi

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13 Nov 2017

वाणिज्यिक कर विभाग के ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश का एक और केस सामने आया





                       वाणिज्यिक कर विभाग के ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश का एक और केस सामने आया

मध्य प्रदेश के वित्त मंत्री और पार्टी की छवि ख़राब करते अधिकारी
विधान सभा में देते है गलत वसूली आकंडे ;- न्यूज़ विजन की जांच जारी
सीना ताने घूम रहे भ्रष्टाचारी शासन नही कर पा रहा कार्यवाही 

प्रकरण है वर्ष 2011 का जिसमे आवेदक व्यवसायी का वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2  द्वारा व्यवसायी को बिना सुनवाई का मौका दिए, उसका टिन पंजीयन रद्द कर दिया था, सूचना अधिकार में प्राप्त आदेश पत्रिकाओ को देखने से समझ आया के 30 दिन में व्यवसायी  नेशनल ट्रेड फेक्टर का पंजीयन 2 बार रद्द किया था अधिकारी ने, एक बार में तो ज्ञात कारणों पे निरस्तीकरण की कार्यवाही अंतर्गत व्यवास्यी ने अधिकारी की कर गढ़ना का मान रखते हुए लगभग 1 लाख रुपये तत्काल वाणिज्यिक कर विभाग के खजाने में जमा कर अपना पंजीयन जीवित कराया

प्रकरण में वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2 ने 12 दिन के अंदर दोबारा अपनी मर्जी से सृजित कारणों के आधार पर व्यवसायी का पंजीयन रद्द कर दिया, सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत,  इस अधिकारी की सेवाए बतौर लोक सेवक जनता के प्रति पूर्णत:  प्रतिकूल, जिनकी कार्यवाही वरिष्ठ अधिकारियो द्वारा नहीं की जाएगी, इस भरोसे की नीव इतनी मजबूत है की जो अधिकारी जैसी चाहे वैसी अपनी दूकान चला रहा है,  तत्कालीन उपायुक्त सुमित्रा वर्मा के द्वार्रा वाणिज्यिक कर  अधिकारी व्रत 2 को दिए गए प्रिंटेड आदेश में पेन से संशोधन कर व्यवसायी का पंजीयन निरस्त किया, जिस पर फर्जी दस्तावेज सृजित करने और उपयोग में  लाने से व्यवसायी को नियोजित तौर पर क्षती कारीत की गयी, यह उत्तम कार्य वाणिज्यिक कर अधिकारी द्वारा किया गया,  भादवि 467-468-471-166-अ-167 जैसी विभिन्न धाराओ में  प्रकरण दर्ज करने हेतु शासन की और व्यवसायी द्वारा आवेदन प्रस्तुत किया गया है,  

एक व्यवसायी दुकान में माल बेचता है, अपीलीय वाणिज्यिक कर विभाग के अधिकारी अपने कार्यालय से न्याय बेच रहे है.

वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2 ने जो पंजीयन रद्द किया था उसकी अपील सुनने का प्रभार  ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश, के पास है, व्यवसायी ने अपील अधिकारी को सारा वृतांत सुनाया बताया और लिखित तर्क प्रस्तुत किये, अपीलीय अधिकारी ने व्यवसायी की अपील ख़ारिज करते हुए कहा  की, वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2 द्वारा निरस्तीकरण की कार्यवाही सही है, नियम विरुद्ध नही है, पर साहब   ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश, ने सुनवाई के दिन वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2 को बुलवाया ही नही था, पक्ष रखने हेतु तर्क वितर्क हेतु अपीलीय अधिकारी ने एक पक्ष की अनुपस्थिति में आदेश पत्रिका में यह आदेश बंद दिनाक लिख कर व्यवसायी से उपस्थिति दर्ज करा ली, इस प्रकरण को ऑनलाइन नंबर जेनरेट कर के नही दिया गया था, ना आवक में दर्ज किया था, बंडल बनाके अपनी सुविधा अनुसार तारीक दे दि थी, और पारित आदेश का वाणिज्यिक कर वेबसाइट पर कोई लेखा जोखा नही है, जबकि पिछले 1 दशक से सारी कार्यवाहियां ऑनलाइन संधारित करने के लिए वेब पोर्टल mptax. बनाया गया है.  इस प्रकार सभी आवेदक इस अपीलीय भ्रष्ट कार्यालय की कार्यवाहियों से अनभिज्ञ है,

अधिकारियो को ऑनलाइन कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में कोई जानकारी नही है, निरस्तीकरण आदेश तब ऑनलाइन सीरियल नंबर के साथ तब प्रिंट होता है जब आदेश पत्रिका में रद्दीकरण हेतु पर्याप्त कारणों के साथ और सुनवाई सूचना पत्र जारी करने की प्रक्रिया संधारित की जा चुकी हो, परन्तु जब एस तरह से आदेश वरिष्ठ कार्यालय से रद्द कर दिए जाते है तो कोई संशोधन बिना कार्यवाही के नही किया जाता, कुछ अधिकारियो को ऑनलाइन कार्य की समझ नही है, और जी एस टी में प्रोमोट कर पदस्त किया गया है, जिसका नतीजा सरकार को और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है,

व्यवसायी के विरुद्ध ना कोई  बकाया शेष थी उक्त अवधी में,  ना कोई रिटर्न/विवरणी लंबित थी, फिर ये निरस्तीकरण व्यक्तिगत लाभ हेतु किया गया हो इसकी सम्भावनाये प्रकट होती है. इन्हें नकारे जाने का कोई तथ्य बताने में वृत्त प्रभारी और ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश असफल रहे है ,  गर किसी कार्य को करने की योग्यता-क्षमता  अधिकारी में नही है तो ऐसी स्थति में डिमोशन / पदावनती क्यों नही होती, सिर्फ पदोन्नती फर्जी उत्कृष्ट सर्विस रिकॉर्ड पर ही दी जाती है, असल सर्विस रिकॉर्ड खंगाला जाये तो ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,  अभी तक बतौर भृत्य पदावनत हो ही चुके होते, यह एक ऐसे पब्लिक सर्वेंट है जिन्हें मात्र एक सामान्य परीक्षा लेके जनता पर लादा गया है, इमानदारी से कर्तव्यों का वहन करने की कसम खाकर नौकरी पाने  वाले यह भ्रष्ट अधिकारी बेरोजगारी से लडाई करते जब नौकरी पा जाते है तो इनका जमीर और सीना 56 इंच चौड़ा हो जाता है, 

व्यवासयी ने इस भ्रष्ट आदेश को अपील बोर्ड में चुनौती दी, जहा किसी बहाने के चलते वाणिज्यिक कर विभाग अपील कार्यालय से कोई उपस्थित नही हुआ, ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,  ने शासकीय अधिवक्ता को उपस्थिति हेतु प्रकरण प्रेषित कर दिया गया, अपीलीय बोर्ड की और से व्यवास्यी के पक्ष में आदेश पारित किया गया जिसके में वाणिज्यिक कर अधिकारी द्वारा की गयी विधि विरुद्द सृजित कारणों पर निरस्तीकरण की कार्यवाही प्राथमिक तौर पर नियम विरुद्ध लक्षित की गयी है, जिस पर आवेदक व्यवास्यी द्वारा तत्कालीन वाणिज्यिक कर अधिकारी और अपीलीय उपायुक ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,  के विरुद्ध फ्रेमिन्ग के तहत व् फर्जी सृजित-कूटरचित  कारणों को व्यवसायी की आदेश पत्रिका में दर्ज कर फर्जी तथ्यों को सही बताया, साथ ही ऐसी आदेश पत्रिका का निर्माण किया जिसका प्रतिउत्तर देने में असफल रहे है, इस प्रकार से इनकी मंशा व्यक्तिगत लाभ हेतु भी हो सकती है, 

व्यवसायी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा पक्ष रखा गया, साथ ही अपीलीय बोर्ड/सदस्य को प्रकरण के सम्बन्ध में पूरी जानकारी दी गयी, प्रकरण में बताया गया की किस प्रकार एक योजना बना कर वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2 के द्वारा पहले व्यवास्यी का पंजीयन रद्द किया, व्यवास्यी ने अपनी फर्म , पंजीयन के सम्बन्ध में जानकारी के लिए 2011 में  सूचना अधिकार के तहत आवेदन दिए जिनको वाणिज्यिक कर अधिकारी वृत्त 2 ने अमान्य किया, देश का यह पहला मामला था जिसमे एक अधिकारी ने सूचना अधिकार 2005 के  तहत दायर आवेदन / अधिनियम की इतनी बुरी भत्सर्ना की हो, इस मामले में तत्कालीन लोक सूचना उपायुक्त सुमित्रा वर्मा द्वारा तत्कालीन वाणिज्यिक कर अधिकारी की भत्सर्ना का पूर्ण समर्थन कर व्यवसायी को उसकी फर्म से सम्बंधित दस्तवेज उपलभध नही कराये, जिसकी बदौलत उन्हें पदोन्नती मिली,  द्रितीय अपील में अपील बोर्ड द्वारा 2014 अक्टूबर में व्यवसायी आवेदक के पक्ष में आदेश पारित कर लोक सूचना अधिकारी और उपायुक प्रथम लोक सूचना अधिकारी की संसदीय भाषा में कड़े शब्दों में निंदा कर लेख किया की, व्यवसायी द्वारा अपनी फर्म से सम्बंधित दस्तावेज माध्यम सूचना अधिकार 2005 के तहत आवेदित किये है, जिसमे नही देने का कोई प्रश्न नही है, और कोई अधिकारी ऐसा नही कर सकता, चाहे जानकारी आवेदक के पास  हो या ना हो, दायर आवेदन को प्रावधानित प्रक्रिया अनुसार दस्तावेज प्रदान करना अधिनियमित है आवेदक को तत्काल निशुल्क सभी दस्तावेज प्रदान कर 15 दिवस के भीतर आयोग को सूचना प्रदान की जाए
 .
आवेदक के द्वारा इन सभी विवरणों से  ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,   अपीलीय अधिकारी को लिखित अवगत कराया था, परन्तु बिना किसी तथ्य को समझे सुने, पंजीयन जीवित करने हेतु दायर अपील अमान्य कर दी गयी, मनमानी दुकानदारी के तहत आदेश पारित कर दिया गया, जिसको अपील बोर्ड में आवेदक ने चुनौती दी और फैसला आया ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,  के द्वारा पारित आदेश के विपरीत जिसमे अपील बोर्ड न्यायलय ने पारित आदेश में स्पष्ट किया की पंजीयन निरस्तीकरण की कार्यवाही पूर्णत अवैध है,  इतनी सी बात पर आवेदक को न्याय मिलने में लगे 6 साल और अब इस मामले में नेशनल प्रेस यूनियन ने ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,   के निलंबन की मांग प्रमुख सचिव से की है, इस अपीलीय कार्यालय में सभी पारित आदेश जांच के पात्र है पहले भी कई प्रकार की अनीयमितताओं के चलते यह अपीलीय अधिकारी सुर्खियों में रहे है, परन्तु भ्रष्टाचार की आय तले सब सफ़ेद है, काला कुछ नही.

प्राप्त जानकारी में पता चला की यह अपीलीय अधिकारी ओ. पी. वर्मा उर्फ़ ओमप्रकाश,   द्वारा कुछ अधीनस्त अधिकारियो की विभागीय जांच में मुख्य जांचकर्ता बतौर पदस्त हुए है, और मामलो को सुना समझा है,  इन सभी मामलो में ओम प्रकाश का निलंबन लॉ एंड आर्डर हेतु आवश्यक है

सिविल प्रक्रिया संहिता, लोक सेवा गारंटी अधिनियम, और प्रमुख सचिव महोदय द्वारा आवेदको के आवेदनों के त्वरित निवारण हेतु जारी  अधिसूचनाओ का भद्र मजाक बनाते अधिकारी, जिनकी लापरवाही का चिट्टा प्रमुख सचिव तक नही पहुँच पाता, निडर हो कर रहे रहे है वाणिज्यिक कर विभाग के अधिकारी लूटमार, गर किसी आवेदक का कोई सम्बन्धी नेता या लोकायुक्त में होता तो अधिकारी भीगी बिल्ली बनने  में देर नही करते,  इस तरह की प्रक्रियाओ के चलते हो रही है शासन की छवि की दुर्गती,   

जनता पर सारे नियम होते है, कानून का पालन करने जो नियुक्त है उस पर कोई कानून लागू नही होता, उस पर कोई कार्यवाही नही होती,

फ़िलहाल इस भ्रष्ट अधिकारी पर कोइ निलंबन की कार्यवाही शुरू नही की गयी है, अगली कार्यवाही अपर आयुक्त जबलपुर से अपेक्षित है जिसके अधिकार  आज कल   किसी समकक्ष अधिकारी के पास सुरक्षित है, जिसने मित्र तुल्य संबंधो के चलते कार्यवाही अपने कार्यक्षेत्र में शुरू नही की है, 

 इस तरह के भ्रष्टाचारियो  को  समाज ही समाज से बहिष्कृत कर सबक सिखा सकता है,  




संपादक जितेन्द्र मखीजा 

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