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27 Apr 2018

Online Shopping करने से पहलें इस खबर को ज़रूर पड़े नहीं तो हो सकता है आपके साथ धोखा

Beware Of Online Shopping Fake Products
एक लाख करोड़ के ई-कॉमर्स मार्केट में नकली प्रोडक्ट का खेल, कस्टमर के अधिकार भगवान भरोसे, कही कोई सुनवाईं नहीँ

1 लाख करोड़ के भारतीय ई-कॉमर्स मार्केट में नकली प्रोडक्ट की भरमार बढ़ती  जा रही है। हर तीसरे व्यक्ति को ऑनलाइन शॉपिंग में नकली प्रोडक्ट मिल रहे हैं। इसके बावजूद कंपनियों से लेकर उनके सेलर्स पर किसी तरह की कोई एक्शन नहीं हो पा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मौजूदा कानून में ऐसे लूपहोल है कि कस्टमर के अधिकार भगवान भरोसे हैं।

कंपनियों पर नहीं हो सकता है कोई एक्शन
ई-कॉमर्स के लि‍ए बनी वि‍देशी प्रत्‍यक्ष नि‍वेश पॉलि‍सी के मुताबि‍क, वि‍देशी कंपनी की स्‍वामि‍त्व वाली ई-कॉमर्स कंपनी अपने प्‍लेटफॉर्म पर बि‍कने वाले प्रोडक्‍ट्स पर वारंटी या गारंटी का ऑफर्स नहीं दे सकती है। ऐसे में कि‍सी भी तरह का अति‍रि‍क्‍त वादा गैरकानूनी है। यह कंज्‍यूजर्स के लि‍ए दुर्भाग्‍यपूर्ण हैं।

सेलर्स पर शिकंजा कसना मुश्किल
एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि‍ ऑनलाइन की तुलना में रि‍टेल स्‍टोर्स पर नकली प्रोडक्‍ट्स को पकड़ना आसान है। ब्रांड गुरू हरीश बि‍जूर ने कहा कि‍ व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर यह बेहद मुश्‍कि‍ल है कि‍ उनके एसेट्स और उनके सोर्स की पहचान की जा सके। इसलि‍ए यह परेशानी बि‍गड़ती जा रही है। ऑनलाइन नकली प्रोडक्‍ट्स की बि‍क्री ब्रांड्स के लि‍ए ज्‍यादा खतरनाक है। अगर ब्रांड्स की नजर से देखेंगे तो नकली सामान को दुरुस्‍थ इलाकों में बेचने से ब्रांड्स को उतना नुकसान नहीं होता जि‍तना ऑनलाइन बि‍कने पर। क्‍योंकि‍ लाखों यूजर्स इस तरह के प्रोडक्‍ट्स को देखते हैं।

क्या कहता है सर्वे
लोकलसर्कि‍ल के एक सर्वे के पहले पोल में 6,923 लोगों में से 38 फीसदी कंज्‍यूमर्स ने कहा कि‍ उनहें बीते एक साल में ई-कॉमर्स साइट से नकली प्रोडक्‍ट मि‍ले हैं। 45 फीसदी ने कहा कि‍ उनके साथ ऐसा नहीं हुआ है जबकि‍ 17 फीसदी ने कहा है कि‍ वह इसके बारे में कुछ नहीं जानते।

लोगों ने जब यह पूछा गया कि‍ कौन सी बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी ने बीते एक साल में नकली प्रोडक्‍ट भेजा है, तो जवाब में 12 फीसदी ने स्‍नैपडील, 11 फीसदी ने अमेजन और 6 फीसदी ने कहा फ्लि‍पकार्ट। 71 फीसदी लोग ऐसे हैं जो या तो ऑनलाइन शॉपिंग नहीं करते या उनहें नकली प्रोडक्‍ट नहीं मि‍ला है।  

अभी क्‍या है कानूनी ढांचा
आईटी एक्‍स 2000 ने ऑनलाइन ट्रांसजैक्शन और इंटरमीडि‍यटरीज की जि‍म्‍मेदारि‍यों और व्‍यवहार को रेग्‍युलेटर करने के लि‍ए वि‍शि‍ष्‍ट नि‍यमों का उल्‍लेख कि‍या गया है, इसमें अहम:
-एक इंटरमीडि‍यटरीज को दूसरे के आईपीआर के उल्‍लंघन के खि‍लाफ सेलर्स को चेतावनी देनी होगी।
-उसे इस तरह के उल्‍लंघन को जानबूझ कर होने की अनुमति‍ नहीं देनी चाहि‍ए।
-अगर उल्‍लंघन का पता चलता है तो इंटरमीडि‍यरीज को कानूनी तौर पर 36 घंटे के भीतर प्रोडक्‍ट या जानकारी को हटाना होगा।

सरकार अभी तक नि‍यमों पर कर रही है वि‍चार
ई-कॉमर्स प्‍लेटफॉर्म पर बिकने वाले नकली प्रोडक्‍ट्स को रोकने और कंज्‍यूमर्स को रिफंड देने के लि‍ए सरकार एक प्रणाली बनाने पर वि‍चार कर रही है। इस तरह के सि‍स्‍टम के लि‍ए बातचीत वैचारि‍क स्‍तर पर है। इस सि‍स्‍टम को 'कैशबैक' कहा जा सकता है।

यह चर्चा ई-कॉमर्स कंपनि‍यों और डि‍पार्टमेंट ऑफ इंडि‍यन पॉलि‍सी एंड प्रोमोशन (डीआईपीपी) के बीच चल रही है। अधि‍कारी ने यह भी कहा कि‍ हमें इस मामले पर और स्‍टेकहोल्‍डर कंसलटेशन की जरूरत है क्‍योंकि‍ इसका मकसद डोमेस्‍टि‍क मार्केट में नकली प्रोडक्‍ट्स की बि‍क्री को रोकना है। इस प्रणाली को सरकार स्‍वैच्‍छि‍क स्‍वभाव के तौर पर इसे देख रही हैं। 

नकली प्रोडक्‍ट से इकोनॉमि‍क लॉस
नकली प्रोडक्‍ट की वजह से मैन्‍युफैक्‍चरर्स और इंटीलेक्‍चुअल प्रॉपर्टी (आईपी) के ब्रांड वैल्‍यू, रेप्‍युटेशन और गुडवि‍ल को कम कर रहा है। इसकी वजह से सोशल और इकोनॉमिक असर पड़ते हैं। इससे टैक्‍स और रेवेन्‍यू में नुकसान होने की वजह से बड़े पैमाने पर इकोमॉनि‍क लॉस होता है। इतना ही नहीं इससे फंड्स का यूज दूसरे गैरकानूनी गति‍विधि‍यों में होता है और इस तरह प्रोडक्‍ट्स कंज्‍यूमर की हेल्‍थ और सेफ्टी के लि‍ए भी खतरा हैं। 

कंपनि‍यों की अपनी पॉलि‍सी
फ्लि‍पकार्ट, स्‍नैपडील और अमेजन जैसी दूसरी बड़ी ई-कॉमर्स कंपनि‍यां वि‍भि‍न्‍न मामलों में अधि‍कतम 30 दि‍न के भीतर प्रोडक्‍ट रीप्‍लेस या रि‍फंड करने के लि‍ए प्रति‍बध हैं। लेकि‍न इन सभी प्‍लेटफॉर्म्‍स पर कई सारे प्रोडक्‍ट अब भी रीफंड पॉलि‍सी से बाहर हैं, वहीं, कुछ माममों में रीफंड भी नहीं दि‍या जाता है। इसके अलावा, कस्‍टमर को रि‍फंड तभी दि‍या जाता है जब वह साबि‍त करते हैं कि‍ प्रोडक्‍ट नकली है।

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