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4 Mar 2019

पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर पुलिस ने की खाना पूर्ति, पत्रकार संगठन भी चुप क्यों

Stop Attacking Journalist Protect The Voice Of Public
जो देखा लिख दिया चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा परन्तु सच्चाई यही है

जंगल के पेड़ों को कुल्हाड़ी काट रही थी, जंगल सिमट रहा था। फिर भी पेड़ों में ये विशवास था कि कुल्हाड़ी में लगा हत्था यानी (लकड़ी) तो उनकी बिरादरी की है। शायद हम पर रहम करे

ये उदाहरण आज के वर्तमान सामाजिक परिवेश में पत्रकारों की एकता पर एकदम सटीक बैठता है। जो ये समझने की भूल कर बैठें हैं कि वे अमुक पत्रकार संगठन से जुड़े हैं।संगठन के समस्त पत्रकार भाई उनकी बिरादरी के हैं। वक़्त पड़ने पर वे एक दूसरे के दुःख दर्द में काम आयेंगे। शायद आप गलत सोंच रहें हैं

यहां तो ये देखा जाता है कि कौन उनके लिए कितना लाभकारी है। विभिन्न प्रकार के चश्मों के नजरिये से किसको कितना आदि हद तय की जाती हैं।

चुनाव में सरपरस्त बनाते समय हमने तो यही ठानी थी। वो सबसे अव्वल है वो सबसे आला है इंसानियत उसका धर्म है। सभी को वो प्यारा है। सभी का वो दुलारा है। जब कदम लड़खड़ाए तो एक पल में ख्वाब चकनाचूर हो गये। वक़्त पड़ते ही हकीकत के हालात हमसे रुबरू हो गये। न कोई मददगार था न वो मसीहा था। यादों और वादों की भीड़ में हम अकेले थे। जब संभलें तो समझ मे आया कि लोहा ही लोहे को काट रहा है। "हम आह भी लेतें तो हो जातें हैं बदनाम। वो कत्ल भी करते तो चर्चा नही होता"। मैं असली वो फ़र्ज़ी मैं बड़ा वो छोटा। हम सब इसी में बंट कर रह गये इससे आगे हम बढ़ ही न सके।

शहर के कुछ उम्रदराज़ अखबार नवीस और नामा निगार हालाते हाज़रा का जायज़ा लेते ही समझ में जाते हैं कि सहाफत पर सियासत किस हद तक हावी है। वे अपने दौर को याद कर बेहद ग़मगीन हो जातें हैं। अपना दौर याद कर उनकी नम आंखों से जो अल्फ़ाज़ बयां हुए वो बेहद शर्मनाक और दुःखद थे। वे आगे कहतें हैं कि "जो कलम कभी क्रान्ति (इंकलाब) लिखा करते थे। उन कलम और कलमकार का आज अभाव हो गया है। नज़राना कहां मिलेगा ये हमारा स्वभाव हो गया है"।

हकराना नज़राना शुक्राना और जबराना अब कलम की ज़ुबा बन गये हैं। कलम की स्याही में अब वो चमक कहां जो पहले कभी हुआ करती थी। फीकी पड़ती स्याही पर स्याह सोंच का कब्ज़ा हो गया। ऐसा महसूस होता है कि उजालों की सरपरस्ती में अंधेरा हो गया। दुनिया की चकाचौंध और बाज़ार में मायावी कलम की स्याही नीलाम हो गयी। दौरे तबाही के मन्ज़र लिखने वालों के लिए वही स्याही इनाम हो गयी।"

जाने कैसा ज़हर दिलों में घर कर गया। परछाई ज़िन्दा रह गयी इन्सान मर गया।

अब तो हालात ऐसे नासाज़ हो गये आंख कुछ देखती है कान कुछ सुनते हैं और ज़ुबा कुछ और कहती है। इस मायावी दुनिया की मक्कारी हमसे सही नही जाती। दिल कहता है

उसूलों पर अगर आंच आये तो टकराना ज़रूरी है। ज़िन्दा हो गर तुम फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।
अब उस कश्ती पर क्यों सवार हों जो मंज़िल से पहले बीच मजधार में छोड़ दे। इस लिए दिल ये कहता है और मेरा भी ये फ़ैसला है।

तुफानो से आंख मिलाओ सैलाबों पर वार करो। अरे मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो।

लखनऊ से स्टेट हेड भानू मिश्रा की कलम से

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