नेशनल लोक अदालत का 08.02.2020 को आयोजन हुआ - News Vision India

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9 Feb 2020

नेशनल लोक अदालत का 08.02.2020 को आयोजन हुआ

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Chief Justice AK Mittal Inaugurates National Lok Adalat Madhya Pradesh News
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नेशनल लोक अदालत का 08.02.2020 को आयोजन हुआ. चीफ जस्टिस ऑफ़ मध्य प्रदेश श्रीमान जस्टिस ए के मित्तल के मार्गदर्शन में आयोजन हुआ व् जस्टिस मित्तल ने जिल न्यायलय जबलपुर का भ्रमण किया.
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इस लोक अदालत में पूरे प्रदेश में कुल 2,80,505 प्रकरण प्रस्तुत किए. शाम 5:30 बजे तक आकडे इस प्रकार रहे, कुल निराकृत प्रकरण 29,507 और कुल अवार्ड रही 92,46,52,629/- रहीं.



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4 परिवार को मिलाया गया और उनको फूल मालाओं से सम्मान कर साथ घर भेजा गया.




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चेक बाउंस के प्रकरण में श्रीमती नौशीन खान की न्यायालय से 48 लाख का प्रकरण प्रेम लाल पटेल विरुद्ध साक्षी डेवेलेपर्स का निराकरण हुआ.

"न्याय में देरी, अन्याय है"

लोक अदालत ?

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम-1978 की धारा 19 में लोक अदालत के आयोजन (गठन) का प्रावधान किया गया है। प्रत्येक राज्य प्राधिकरण या जिला प्राधिकरण या सर्वोच्च कानूनी सेवा समिति या प्रत्येक उच्च न्यायालय कानूनी सेवा समिति या जैसा भी हो, तालुक कानूनी सेवा समिति ऐसे अंतराल या स्थानों पर लोगो के लिए लोक अदालत का आयोजन कर सकती है। लोक अदालत ऐसे क्षेत्रों के लिए इस तरह के क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है जैसा की वह उचित समझती है। इसके अलावा आज के परिवेश में इसके गठन का आधार 1976 का 42वां संविधान संशोधन है, जिसके अंदर अनुच्छेद 39-A में आर्थिक न्याय को जोड़ा गया। लोक अदालत को अमल में लाने के दो मुख्य कारण हैं, पहला यह कि आर्थिक रूप से कमजोर होने कि वज़ह से बहुत सारे लोग न्याय पाने के लिए संसाधन नहीं जुटा पाते। दूसरा अगर वह कोर्ट तक पहुँच भी जाते हैं, तो करोड़ों मुक़दमे लंबित और अपूर्ण होने के कारण उनको समय से न्याय नहीं मिल पाता।

लोक अदालत एक ऐसी अदालत / मंच है जहाँ पर न्यायालयों में विवादों / लंबित मामलो या मुकदमेबाजी से पहले की स्थिति से जुड़े मामलो का समाधान समझौते से और सौहार्दपूर्ण तरीके से किया जाता है। इसमें विवादों के दोनों पक्ष के मध्य उत्त्पन हुए विवाद को बातचीत या मध्यस्ता के माध्यम से उनके आपसी समझौते के आधार पर निपटाया जाता है।

समझौते के लिए लोक अदालत में किस आधार पर जाया जा सकता है?


आप अपने विवाद को लेकर आसानी से लोक अदालत का दरवाजा खट-खटा सकते हैं,वो भी बिना कुछ ख़र्च किये। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम,1987 की धारा 18(1) के अनुसार इस बात को हम दो भाग में समझ सकते हैं; पहले भाग में मान लीजिये आपका विवाद न्यायलय में लंबित है,अब सबको पता ही है कि मुक़दमे को निपटाने के लिए अदालत अधिक समय लेगी। तब आप इस स्थित में कोर्ट की अनुमति से लोक अदालत के लिए जा सकते हैं, और विपक्ष के साथ आपसी बात-चीत से अपना मसला समय रहते सौहार्दपूर्ण ढंग से हल कर सकते हैं।समझौते के बाद आपकी कोर्ट फ़ीस भी वापस कर दी जाएगी। दूसरे भाग में हम यह कह सकते हैं कि आपका झगड़ा हुआ और आप सीधे स्थायी लोक अदालत पहुँच गए, मतलब अदालती कार्यवाही शुरू होने के पहले । परन्तु यहाँ पर एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि स्थायी लोक अदालत में जाने के लिए पक्ष-विपक्ष दोनों का राज़ी होना ज़रूरी है, क्योंकि तभी तो आपसी सामंजस्य से मामला हल होगा।

लोक अदालत की शक्तियां ?


विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम की धारा 22 उपधारा (1) के तहत लोक अदालत को इस अधिनियम के अधीन कोई अवधारण करने के प्रयोजन के लिए, वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अधीन सिविल न्यायालय में है।

लोक अदालत के समक्ष किस प्रकार के मामले लाये जा सकते हैं?


आपसी ताल-मेल से हल न हो पाने वाले संज्ञीन आपराधिक मामले जैसे कि किसी की हत्या आदि के अलावा सभी प्रकार के मामलों को लोक अदालत लाया जा सकता है, इस प्रकार के अपराधों को दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 320 में विस्तार से लिखा गया है। जैसे कि; वैवाहिक मामले सिविल मामले पेंशन और अन्य सेवा संबंधी मामले जैसे कि रेलवे मुआवज़ा श्रम विवाद भूमि अधिग्रहण मामले मनरेगा से जुड़े मामले बिजली और पानी से जुड़े मामले आपदा मुआवज़ा जैसे कि फसल में आग लग जाना इत्यादि लोक अदालतों के विभिन्न स्तर और प्रकार क्या हैं? विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अनुसार लोक अदालत मुख्यतः दो प्रकार की होती है एक स्थायी लोक अदालत और एक अस्थायी लोक अदालत जिसका आयोजन समय-समय पर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण सर्वोच्च न्यायालय से लेकर तहसील स्तर तक करवाता है। स्थायी लोक अदालत और अस्थायी लोक अदालत में अंतर स्थायी लोक अदालत में आप अपना मामला सीधे ले के जा सकते हैं,

दीवानी सम्बंधित मामले।

बैंक ऋण सम्बंधित मांमले।

वैवाहिक एवं पारिवारिक झगड़े।

राजस्व सम्बंधित मामले।

दाखिल ख़ारिज भूमि के पट्टे।

वन भूमि सम्बंधित मामले।

बेगार श्रम सम्बंधित मामले।

भूमि अर्जन से सम्बंधित मामले।

फौजदारी सम्बंधित मामले।

मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजा सम्बंधित दावे।

अंततः जब अदालत को लगता है कि विवाद का निपटारा पार्टियों द्वारा स्वीकार्य हो सकता है, तब अवलोकन और संशोधनों के लिए पार्टियों को सूचित किया जाता है और तदनुसार, विवाद को हल किया जाता है। लोक अदालत कोई सीधा फैसला नहीं करेगी, इसके बजाय दोनों पक्षों के बीच समझौता के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। लोक अदालत के सदस्य विवाद को सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचने के लिए अपने प्रयासों में स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से पार्टियों की सहायता करेंगे। दोनों पक्षों के सहमत ना होने पर क्या विकल्प हैं? वैसे तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पीटी थॉमस बनाम थॉमस में यह कहा था कि- "लोक अदालत द्वारा घोषित निर्णय अंतिम और बाध्यकारी है।" इसका मतलब आप आगे अपील नहीं कर सकते।

Contact: Dr. Siraj Khan 9589333311

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