किसान गोष्ठी, 200 किसानों को किण्वित जैविक खाद और मृदा स्वास्थ्य की दी गई जानकारी

जबलपुर, 26 अक्टूबर। किसानों को आधुनिक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों से जोड़ने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के अमनाला-खमरिया गांव में किसान गोष्ठी आयोजित की गई

• जबलपुर के अमनाला-खमरिया गांव में किसान गोष्ठी का आयोजन, करीब 200 किसानों ने लिया भाग।
• किण्वित जैविक खाद (FOM) के उपयोग और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के तरीकों पर दी गई जानकारी।
• वैज्ञानिकों ने जैविक और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल पर दिया जोर।
• किसानों को मृदा परीक्षण, मिट्टी के नमूने एकत्र करने और संतुलित पोषण प्रबंधन की समझाई गई प्रक्रिया।
• प्रश्नोत्तरी के जरिए किसानों की भागीदारी बढ़ाई गई और सही जवाब देने वाले प्रतिभागियों को किया गया सम्मानित।

जबलपुर, 26 अक्टूबर। किसानों को आधुनिक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों से जोड़ने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के अमनाला-खमरिया गांव में किसान गोष्ठी आयोजित की गई। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली के सस्य विज्ञान संभाग द्वारा मारुति सुजुकी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के आर्थिक सहयोग से संचालित परियोजना के तहत हुए इस कार्यक्रम में करीब 200 किसानों ने भाग लिया। गोष्ठी में किण्वित जैविक खाद (FOM), मृदा स्वास्थ्य, संतुलित पोषण प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े विषयों पर वैज्ञानिक जानकारी दी गई।

कार्यक्रम में डॉ. एस. एस. राठौर, समन्वयक एवं प्रमुख, सस्य विज्ञान संभाग, ICAR-IARI ने किण्वित जैविक खाद की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और कृषि उत्पादन को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए पोषक तत्वों का उचित प्रबंधन आवश्यक है। उन्होंने किसानों को जैविक और रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी, ताकि फसलों को जरूरी पोषण मिलने के साथ मृदा स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहे।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुभाष बाबू ने परियोजना के उद्देश्यों और इसके तहत की जा रही प्रमुख गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किण्वित जैविक खाद का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने तथा उसके भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार करने में सहायक हो सकता है। उन्होंने किसानों से परियोजना के अंतर्गत आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, खेतों में किए जाने वाले परीक्षणों और अन्य गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करने का आह्वान किया।
वैज्ञानिक डॉ. विशाल त्यागी ने जैविक और प्राकृतिक खेती की उपयोगिता पर चर्चा करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि खेती में जैविक आदानों का उचित इस्तेमाल और कृषि सामग्री का विवेकपूर्ण उपयोग मृदा स्वास्थ्य सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही, खेती की लागत को नियंत्रित करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
वैज्ञानिक डॉ. अर्जुन सिंह ने किसानों को मृदा परीक्षण के महत्व और मिट्टी के नमूने एकत्र करने की सही विधि समझाई। उन्होंने बताया कि खेत के अलग-अलग हिस्सों से प्रतिनिधि नमूने एकत्र कर प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजना चाहिए। मृदा परीक्षण से प्राप्त परिणामों के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करने से फसलों की पोषण संबंधी जरूरतों को समझने और संतुलित खाद प्रबंधन अपनाने में मदद मिल सकती है। इससे अनावश्यक उर्वरक उपयोग से बचने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में भी सहायता मिलती है।
गोष्ठी में कृषि क्षेत्र से जुड़े अन्य विशेषज्ञों ने भी हिस्सा लिया। इनमें डॉ. आनंद विश्वकर्मा, परियोजना समन्वयक, अखिल भारतीय समन्वित तिल एवं रामतिल अनुसंधान परियोजना, जबलपुर; डॉ. अमित झा, खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर के वैज्ञानिक; कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के वैज्ञानिक और राज्य कृषि विभाग के अधिकारी शामिल रहे। विशेषज्ञों ने किसानों से सीधे संवाद कर उनकी कृषि संबंधी समस्याओं पर चर्चा की और खेती से जुड़े विभिन्न विषयों पर तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया।
किसानों की सहभागिता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम के दौरान किण्वित जैविक खाद, मृदा स्वास्थ्य, संतुलित पोषण प्रबंधन और टिकाऊ कृषि से संबंधित प्रश्नोत्तरी भी आयोजित की गई। सही उत्तर देने वाले किसानों को पुरस्कृत किया गया। इस दौरान किसानों ने अपने खेती के अनुभव साझा किए और कृषि संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिकों से सुझाव प्राप्त किए। गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी पहुंचाना, मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा करना, किण्वित जैविक खाद के उचित उपयोग को बढ़ावा देना और प्राकृतिक संसाधनों के कुशल इस्तेमाल के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा। कार्यक्रम में टिकाऊ और लाभकारी कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए वैज्ञानिकों तथा किसानों के बीच संवाद को महत्वपूर्ण बताया गया।

Report: Dr. Siraj Khan +91 9589333311

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