घर या मंदिर नहीं, यहां जेल में एक मुस्लिम हर मंगलवार पढ़ता है सुंदरकांड का पाठ

घर या मंदिर नहीं, यहां जेल में एक मुस्लिम हर मंगलवार पढ़ता है सुंदरकांड का पाठ

Religious Activity In Jail Uttar Pradesh
सुल्तानपुर। यहां हर मंगलवार  को संकटमोचन हनुमानजी की होती है आरती और गाया जाता है तुलसीदास कृत रामचरित मानस का सुंदरकांड । यहां हनुमानजी की आरती ,  रामायण पाठ और रामचरित मानस के सुन्दरकाण्ड  का गायन किसी पंडित  पुरोहित  या गायक मंडली द्वारा नहीं गाया जाता बल्कि यहां गायक कलाकार होते हैं. गम्भीर अपराधों के अपराधी, माफिया और सजायाफ्ता कैदी। श्रोताओं और भक्तजनों में होते हैं खाकी वर्दीधारी  अधिकारी और कर्मचारी। इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि यह आरती, रामायण और सुंदरकांड का पाठ किसी मन्दिर में नहीं, किसी पवित्र स्थान पर नहीं और न ही किसी यजमान के घर होती है, बल्कि यह आरती, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ होता है जिला कारागार सुल्तानपुर में और यहां हर मंगलवार को होने वाले सुंदरकांड पाठ का आयोजक होता है एक मुस्लिम। 
    
जी हाँ, सुल्तानपुर जिला जेल में बन्द हत्या के एक मामले में सजा काट रहे अब्दुल वाहिद नामक एक मुस्लिम कैदी हर मंगलवार सुंदरकाण्ड का पाठ करवाकर गंगा-यमुनी तहजीब की नई मिसाल कायम कर रहा है। हर मंगलवार खुद अब्दुल वाहिद  जेल में बंद अन्य बंदियों के साथ सुंदरकाण्ड की चौपाइयां पढ़ते हैं और ताली बजाकर मगन हो जाते हैं । अब्दुल वाहिद को देखकर अन्य बन्दी ,बन्दीरक्षकऔर कैदी भी भावविभोर हो जाते हैं ।

3 साल पहले शुरू किया था पाठ
यहां जिला जेल में 65 साल के अब्दुल वाहिद को पांच साल पहले हत्या के एक मामले में 10 साल की  सजा मिली थी। साल 2016 में उन्होंने तत्कालीन  जेल अधीक्षक प्रमोद कुमार शुक्ल  के सामने हर मंगलवार को जेल में सुंदरकाण्ड करवाने की इच्छा जाहिर की। उन्हें  अब्दुल वाहिद का विचार और उनकी यह सोच बहुत अच्छी लगी और वो तुरंत इसके लिए राजी हो गए । मार्च 2016 से जेल में सुंदरकाण्ड का आयोजन नियमित चल रहा है। अब्दुल वाहिद न सिर्फ सुंदरकांड पाठ का आयोजन करते हैं, बल्कि वे खुद सुंदरकाण्ड की चौपाइयां भी पढ़ते हैं।

गुरुओं से मिले ज्ञान को बांट रहे अब्दुल वाहिद
बकौल वाहिद, मैंने हिन्दी माध्यम से स्कूली पढ़ाई की थी। मेरे गुरुओं ने जो शिक्षा दी थी, उसका काफी असर आज भी मुझ पर है। मेरी नजर में  कोई धर्म बड़ा या छोटा नहीं होता है। मैं सभी धर्मों में समान आस्था रखता हूं ,क्योंकि " मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना । "

बताते हैं अब्दुल वाहिद के इस प्रस्ताव का जेल में बंद सभी बन्दी, कैदी और जेल अधिकारियों कर्मचारियों ने  दिल खोलकर स्वागत किया ।"सुंदरकाण्ड के बहाने जेल के सभी कैदी ध्यान मग्न होकर ईश्वर को याद करते हैं। इससे आपसी भाईचारा बढ़ता है। जेल के अधिकारी भी इसमें शामिल होते हैं।"

भानु मिश्रा ब्यूरों चीफ़ न्यूज़ विज़न सुल्तानपुर

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