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19 Nov 2018

डिफाल्टरो के संरक्षक, CIC से मिली फटकार, RTI ACT 2005 बेअसर, लोकपाल अधिनियम विल्पुत होती प्रजाति


RTI INFORMATION NEGLIGENCE BY PMO
यूँ तो सूचना  अधिकार कानून का शोषण लगभग सुबह शाम होता है, जिसके चलते अपील पे अपील दर्ज होती है, अनावश्यक न्यायालयो में याचिकाए दायर होती है, ऐसा ही एक आवेदन रिसर्व बैंक से अपेक्षित डिफाल्टर लिस्ट का रिकॉर्ड का मामला  द्वितीय अपील में सी आई सी के पास पहुंचा फटकार मिली प्रधान मंत्री कार्यालय को, 

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून का उल्लंघन करने के कारण कड़ी फटकार लगाई है :

 सीआईसी ने कहा कि ये गैरकानूनी है कि पीएमओ आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा भेजी गई बड़े घोटालेबाजों की सूची पर जानकारी नहीं दे रहा है.

बीते दो नवंबर को केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने एक समाचार पत्रिका की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए पीएमओ, वित्त मंत्रालय और आरबीआई को आदेश दिया था कि वे 16 नवंबर 2018 से पहले बताएं कि रघुराम राजन की सूची पर क्या कदम उठाया गया है.

आरबीआई, पीएमओ और वित्त मंत्रालय रघुराम राजन द्वारा भेजी गई सूची को सार्वजनिक करने और उस पर की गई कार्रवाई के बारे में जानकारी देने से मना कर रहे हैं. सीआईसी के आदेश के बावजूद पीएमओ ने ये जानकारी नहीं दी.

बीते 16 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने पीएमओ की सभी दलीलों को खारिज करते हुए एक बार फिर ये आदेश दिया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय रघुराम राजन द्वारा भेजे गए बड़े डिफॉल्टरों के नाम और उन पर की गई कार्रवाई के बारे में जानकारी दे.

सीआईसी संदीप सिंह जादौन द्वारा दायर आरटीआई आवेदन को लेकर सुनवाई कर रही थी. संदीप सिंह ने 50 करोड़ और उसे ऊपर के बैंक डिफॉल्टरों के बारे में जानकारी मांगी थी.

पीएमओ ने तर्क दिया कि आरटीआई आवेदन मूल रुप से पीएमओ के साथ दायर नहीं की गई थी इसलिए सूचना नहीं दी जा सकती और इस पर सूचना आयुक्त के आदेश का पालने करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है.

इस पर आचार्युलु ने कहा, ‘आयोग किसी भी कानूनी आधार के बिना अनुचित व्याख्याओं द्वारा सूचना नहीं देने के इस तरह के प्रयास से सहमत नहीं हो सकता है. आरटीआई एक्ट में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो सूचना आयोग को किसी भी सरकारी विभाग को जानकारी देने के लिए निर्देश देने से रोकता है.’

आचार्युलु ने कहा कि पीएमओ द्वारा ये कहना की सूचना आयुक्त का आदेश उचित नहीं है, ये बात सूचना के अधिकार की भावना के अनुरूप नहीं है. पीएमओ ये नहीं कह सकता कि सूचना आयुक्त अन्य सरकारी विभाग से जानकारी देने के लिए नहीं कह सकते हैं.

सीआईसी ने कहा, ‘लोन डिफॉल्टरों की पहचान और उन पर की गई कार्रवाई की जानकारी जनहित का मामला है.

 देश के हर एक नागरिक को ये जानने का अधिकार है. पीएमओ द्वारा इस मामले में जो कदम उठाया जा रहा है उससे जनता का भला नहीं होगा.’

आचार्युलु ने कहा, ‘साल 2005 में जब आरटीआई एक्ट पास किया गया था तो उस समय संसद का ये उद्देश्य नहीं था कि इसे बेहतर तरीके से लागू करने के बजाय जानकारी छुपाने और मना करने की कोशिश की जाए. पीएमओ ये नहीं कह सकता है कि उसके पास जानकारी नहीं है.’

बता दें कि नागरिकों के लिए आरटीआई अधिनियम को लागू करने और कार्यान्वित करने के लिए सीआईसी सर्वोच्च स्वतंत्र निकाय है.

श्रीधर आचार्युलु ने कहा, ‘अगर रघुराम राजन द्वारा भेजे गए पत्र पर कोई कार्रवाई हुई है तो पीएमओ ये बता सकता है और अगर नहीं हुई है तो वो भी बता सकता है. इसके अलावा अगर किसी जानकारी को बताने से छूट है तो पीएमओ वो भी बता सकता है. लेकिन पीएमओ ने गैर-कानूनी आधार पर सीआईसी के निर्देशों का पालन करने से मना कर दिया.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यह दुर्भाग्य की बात है. पीएमओ का नैतिक, संवैधानिक और राजनीतिक कर्तव्य है कि वो भारत के नागरिकों को बड़े बैंक डिफॉल्टर्स और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी दे. लोगों के अधिकार से इनकार करना उचित नहीं है.’

सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने आरबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट और सीआईसी के आदेश का उल्लंघन करना और आरटीआई कानून का पालन नहीं करने को लेकर संसदीय समिति को सुझाव भेजा है. 

सीआईसी ने लिखा की आरबीआई जैसे संस्थान आरटीआई कानून का पालन नहीं कर रहे हैं इसलिए संसदीय समिति आरबीआई द्वारा पारदर्शिता कानून को लागू करने को सुनिश्चित करे.

आचार्युलु ने इस मामले में संसद की सार्वजनिक लेखा समिति के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्राक्कलन समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और वित्त समिति के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली से हस्तक्षेप करने की गुजारिश की है.  

आरबीआई में सुधार और बदलाव की सख्त जरूरत है.’
सीआईसी ने कहा कि आरबीआई को 11 मामलों में सूचना देने का आदेश दिया जा चुका है लेकिन अभी तक एक भी मामले में आदेश का पालन नहीं किया है. जबकि सुप्रीम कोर्ट आरबीआई की सभी दलीलों को पहले ही खारिज कर चुका है.

सीआईसी ने यह भी सिफारिश की कि सार्वजनिक लेखा समिति आरबीआई में आरटीआई अधिनियम के अनुसार जवाबदेही प्रदान करने के लिए इन सवालों पर विचार-विमर्श करने पर विचार करे.

सीआईसी ने इस बात को लेकर खतरा बताया कि अगर आरबीआई पारदर्शिता के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करता है तो ये गोपनीय के वित्तीय शासन में तब्दील हो जाएगा. इसकी वजह से वित्तीय फ्रॉड होंगे और घोटालेबाज आसानी से देश छोड़कर भाग सकेंगे, जैसा कि हाल के दिनों में हुआ है.

आयोग ने कहा, ‘इसलिए जल्द से जल्द इस दिशा में प्रभावी कदम उठाया जाना चाहिए और आरबीआई की एंटी-आरटीआई नीति के विरुद्ध उचित कार्रवाई हो.’


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